भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

पद

अब हौं तोहिं जान्यो संसारा । जब लौं तोहिं कछु स्वारथ दीखत, तब लौं तू करि मृदु व्यवहारा । होत जबहिं निज स्वारथ पूरन, जानु मक्षिका क्षीरहिं धारा । स्वारथ हानि होत न पूछत, मातु पिता सुत भ्राता दारा । जब अनुसार कर्म नहिं निज लौं, सोइ हन्यति जोइ सिरजनहारा । मूढ़ बनावत सब निज जनु ते, चूसत नित ज्यों जोंक प्रकारा । बलिहारी गुरु “श्वेत” ज्ञान की, अंध जगत मंह ह्वै उजियारा ।।
भावार्थ:- हे संसार वालों अब मैं तुम्हें जान गया हूँ ।
जब तक तुम्हें किसी से अपना स्वार्थ सिद्ध होता दिखलाई पड़ता है, तब तक तुम उससे बहुत ही मधुर व्यवहार करते हो और इस मधुर व्यवहार की मात्रा (कम या ज्यादा) उससे सम्बंधित स्वार्थ पर निर्भर करती है ।
जैसे ही उससे तुम्हारा स्वार्थ पूरा हो जाता है, वैसे ही तुम उसे दूध में गिरी हुई मक्खी के समान जानकर अपने जीवन से निकाल कर फेंक देते हो ।
चाहे माता हो, पिता हो, पुत्र हो, भाई हो, पत्नी हो कोई भी हो, अगर उसे लगता है कि तुम्हारे द्वारा उसका स्वार्थ सिद्ध नहीं हो रहा है या स्वार्थ सिद्धि में हानि हो रही है तो वह पूछता तक नहीं । माँ बच्चे का गला घोंट देती है, बाप बेटे को गोली मार देता है, भाई भाई की हत्या कर डालता है, पत्नी पति को ही ज़हर दे देती है और इसी प्रकार दूसरी तरफ से भी ऐसा व्यवहार अगर स्वार्थ की पूर्ति न हुई तो ।
जब तुम्हारे स्वार्थ हित के अनुसार कोई कर्म नहीं करता तो तुम उसे ही मार डालते हो या रिश्ता ख़त्म कर देते हो जो तुम्हारा सृजनहार था अर्थात जिसने तुम्हें पैदा किया था या पाला पोसा था या किसी भी क्षेत्र में तुम्हें उठाया या बनाया होता है, स्वार्थ-सिद्धि होने पर तुम उसे अपने जीवन से निकाल कर बाहर कर देते हो।
इस संसार में सब एक दूसरे को स्वार्थ हित मूर्ख बना रहे हैं कि “हम तुम्हें प्यार करते हैं l” जबकि ऐसा कुछ नहीं है, स्वार्थ के लिए सब एक दूसरे को चूस रहे हैं जैसे एक जोंक किसी शरीर से चिपककर खून पीता रहता है और जैसे ही पूरा पी लेता है उस शरीर से अलग हो जाता है।
“श्वेत” कवि कहता है कि मैं उस अपने गुरु के ज्ञान पर बलिहार जाता हूँ जिससे मुझे इस सत्य का अनुभव हुआ और इस मोह से अंधे जगत में ज्ञान का प्रकाश हुआ।
श्याम पिय दै देहु मोहिं नित रोना। निशि-दिन छिन-छिन अश्रु बहाऊँ, ऐसोहिं करि देहु टोना। विरह अगनि मँह ऐसोहिं जारो, अगनि तपत ज्यों सोना। नैन नीर मन शुद्ध करहुँ अस, मलिन वसन ज्यों धोना। कनक समान बनावत भक्तिहुँ, यहु पारस नहिं खोना। श्रेष्ठ वियोगहिं जामें चहुँदिशि, दीखत श्याम सलोना। वह संयोगहिं बिनुहिं वियोगहिं, भोजन करत अलोना। चहत “श्वेत” इक काम श्याम हित, अँसुवन माल पिरोना।
भावार्थ:- हे मेरे प्रियतम श्यामसुंदर, मुझे हर पल का, हमेशा का रोना दे दो अर्थात विरह दे दो । रात-दिन पल-पल तुम्हारे वियोग में मैं अश्रु बहाता रहूँ, ऐसा कुछ जादू-टोना सा कर दो ।
विरह की अग्नि में तप कर मैं ऐसे निखर जाऊँ, जैसे अग्नि में तपकर सोना।
भगवान के विरह की व्याकुलता में बहने वाले आँसू मन को उसी प्रकार स्वच्छ कर देते हैं जैसे गंदे वस्त्र को पानी साफ़ कर देता है। यह आँसू भक्ति को स्वर्णिम बना देता है l इसीलिए ऐसे अश्रु रूपी पारस को मैं नहीं खोना चाहता।
वियोग सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि मिलन में प्रियतम एक ही जगह दिखाई देता है पर वियोग में प्रियतम सर्वत्र दिखाई देता है।
वियोग रहित संयोग, नमक रहित भोजन की तरह स्वादहीन लगता है।
अब श्वेताभ की यही एक कामना है कि श्यामसुंदर के निमित्त दिन-रात प्रतिपल आँसुओं की माला बनाता रहे।

कबीरदास जी के भी शब्दों में भाव-

कबीर हँसना दूर कर, रोने में कर चीत।
बिन रोये कस पाइये, प्रेम पियारे मीत।।

हँसि हँसि कंत न पाईया, जिन पाया तिन रोय।
हाँसे खेले पीव बिन, कवन सुहागिन सोय।।

चल्यो हौं छाँड़ि जगत की रीत। पायो प्रेम परम प्रियतम को, इक पल मँह गयो सबको जीत। तजि के झूठे नात जगत के, पायो हौं अब साँचो मीत। मधुर मधुर पी प्रेम पियाला, अब सब लाग्यो खारो तीत। बौराई डोलूँ इत उत नित, गुन गुन गनि गाऊँ पिय गीत। अँसुवन हार पिरोवति पल पल, अब करूँ यामिनी दिवस व्यतीत। महाजीत ते यारी भयी अब, होउ अनीत नित नित भयभीत। पग पग परत पंथ परिव्राजक, पावत पल पल प्रेम प्रतीत। अब यह श्वेत हृदय मतवारो, पी के भंग इक श्याम की प्रीत।
भावार्थ:- अब मैं सब जगत की रीति (भला बुरा) इत्यादि सब छोड़कर चल पड़ी हूँ । मुझे परम प्रियतम, जो जड़ चेतन के प्राणाधार हैं ऐसा प्रेम तत्व मिल गया है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि मुझे सब कुछ मिल गया है और सम्पूर्ण संसार को मैंने जीत लिया है । संसार के झूठे नाते-रिश्ते को छोड़ दिया है और एक सच्चे मित्र को पा लिया है ।
जब से उस मधुर प्रेम प्याले को मैंने पिया है, मुझे संसार, रिद्धि-सिद्धि, भुक्ति-मुक्ति, इत्यादि सब तीखा और खारा लगने लगा है। वह प्रेम रस मदिरा पी कर अब मैं बौराई हुई इधर उधर डोलती रहती हूँ और अपने उस पिय के गीत सतत् गाती और गुनगुनाती रहती हूँ । जब से उस प्रेम के प्याले को पिया है तब से बस प्रेम के आँसू के बूंदों की माला दिन-रात पिरोती रहती हूँ ।
जब से उन महाजीत से मेरी यारी हुई है तब से अनीति, त्रिदोष इत्यादि भयभीत हुए पड़े हैं । प्रेम रस मदिरा के नशे में मेरे पग पग इधर उधर परिव्राजक (इधर उधर घूमने वाला) बन गए हैं, कोई सुधि नहीं है कि वो कहाँ जा रहे हैं और कहाँ पड़ रहे हैं, परंतु जहां जहां भी पड़ते हैं बस हर पल प्रेम से ही सराबोर प्रतीत होते हैं । अब यह शुद्ध हृदय (श्वेत हृदय / जिस हृदय में संसार विषयक कोई भी वस्तु न हो) वह श्यामसुन्दर के प्रेम रूपी भाँग को पी पी कर मतवाला बन गया है l
फल भखिहैं पुनि सब उड़ि जइहैं । जब लौं रसमय फल लटकत रह, तब लौं खगदल नित चहचइहैं । मधुर मधुर कलरव करि करि के, डाल डाल इत उत फुदकइहैं । तरुहिं मंजरी मधु लूटन हित, चहुँदिशि ते अलिदल मडरइहैं । पुष्प पराग कुसुम कण हित नित, कृमि कीटक दल घेरे रहिहैं । तरुवर की शीतल छैंया हित, जीव जंतु सब डेरा डरिहैं । जेहिं दिन श्री विहीन हो तरुवर, खगदल करन बीट नहिं अइहैं । कहत “श्वेत” जब पुनि फल लगिहैं, दौरि दौरि सब जन पुनि अइहैं । सखि सुनु वह मुरली की तान । परत सुनाई जब कानन मंह, धावत बिनु पद त्रान । करि प्रवेश श्रवनन ते सुगमहिं, बेधि ह्रदय बनि बान करि संधान तान बानन ही, खींचत तनु ते प्रान धावत लोक लाजि तजि ऐसो, करत नहीं कछु भान । कहत “श्वेत” वह मुरलि मधुर धुनि, रसिक रसहिं रसखान ।
भावार्थ:- एक भगवद प्राप्त और कृष्ण कृपा कटाक्ष से पीड़ित ब्रजांगना अपनी दूसरी उसी स्तर की रसिकलब्ध तत्ववेत्ता गोपी से कहती है कि हे सखी ! वह मुरली की तान जब सुनती हूँ तब मैं अत्यधिक व्याकुल हो जाती हूँ ।
जब वह मधुर मुरली की धुन जब कानों में पड़ती है, ये कान मेरे शरीर को उसी तरफ खींचे चले ले जाते हैं, यहाँ तक कि मैं नंगे पैरों उधर ही दौड़ी चली जाती हूँ ।
यह वंशी की मधुर ध्वनि सुगमता से कानों द्वारा प्रवेश करती है और मेरे हृदय को बाण बनकर वेध देती है ।
वह छलिया ऐसी मुरली बजाता है जैसे किसी ने बाण को धनुष पर संधान करके खींच दिया है और ऐसे खींचता है जैसे तन से प्राण खींचा जाता है ।
उस मुरली की धुन सुनकर बिना किसी लोक-लाज, समाज इत्यादि का सोच किये हुए ही मैं उधर दौड़ी चली जाती हूँ ।
वह भगवदीय कृपा आलप्त एवं पूर्ण महापुरुष शुद्ध श्वेत तत्ववेत्ता गोपी कहती है कि हे सखी ! वह मुरली की मधुर ध्वनि रसिकराज श्रीकृष्ण के रस को प्रदान करने वाली रसों की खान है ।
नोट:- मुरली की वह मधुर ध्वनि एकमात्र भगवदप्राप्त महापुरुष ही सुन सकता है। मुरली की उस दिव्य ध्वनि को सुनने के लिए दिव्य कान भी चाहिए क्योंकि मायिक कानों से वह ध्वनि सुनी ही नहीं जा सकती चाहे स्वयं श्रीकृष्ण कानों के पास आकर ही मुरली वादन क्यों न करें ।
ब्रजमंडल में एकमात्र गोपियों को (अर्थात भगवदप्राप्त तत्ववेत्ता रसिक महापुरुष) ही उनकी उस दिव्य ध्वनि का रसपान करते थे।
कर्मभिरत नित खग प्रति पल पल। उठि करि भोर किरण ते पहिले, भरत उदरकृमि, कीटक, फल, जल। उड़ि उड़ि सुतल वितल भू तल तल, परिश्रम बनि नित चंचल। तृण तृण जोरि जोरि चहुँदिशि ते, निर्मित करत नीड़ निज संबल। प्रणय मास जब आय, मिलन करि, अंडरूप महँ पाव योगफल। करि करि यतन भरत शिशु उदरन, रक्षण करत सकल खल रिपु दल। जब निकसत शिशु पंखनाल तनु, भूलि तात, उड़ि जात गगन तल। ऐसोहिं मानव करत कर्म नित, जनु खग कर्म करत नित अविचल। बहुविधि नाच नचावत माया, सकल जीव नित पियत गरल मल । अंतर नहिं कछु दीखत इत उत, मनुज कर्म पशुदल अरु खगदल। सकल धर्म ग्रंथन लेखिन कह, इक अंतर विशेष जानुहिं भलह l बुधि प्रधान यहु देह पाय नर, करहिं विलग सब कर्म ते पशुदल। उत सब कर्म होत निज तनु हित, नहिं चिंतित निज आतम अरु कल। उत तनु बस इक भोग योनि सम, नहिं स्वतंत्र कोउ करन कर्म भल। मानि बात हरि अरु उन हरिजन, कर्म करहुँ तनु होय सुफल फल। होइहैं नाहिं कोऊ निज आपुन, मरि मरि मनुज करे चंह छलबल। इक दिन सब पंछी उड़ि जइहैं, अइहैं न काम अंत कोउ जन बल। तनहिं कार में, मनहिं यार में, यहु इक ज्ञान राखु बुधि कौशल। करू व्यवहार जो लागि आवश्यक, करहुँ प्रेम प्रभु हो नित विह्वल। नीर बहावहुँ हरिहिं मिलन हित, करूँ निर्मल मन जनु गंगाजल। गांठि बाँधु यह बात "श्वेत" को, जनि उलझहुँ यहु जग मल दलदल।
भावार्थ:- एक पक्षी, चिड़िया निरंतर अपने कर्म में रत है। लगातार काम कर रही है। सुबह, जब सूर्य की प्रथम किरण भी नहीं पहुंची होती, उससे पहले उठकर वह अपना पेट कीट, कृमि, मकोड़े, फल और जल से भरती है। चारों दिशाओं में उड़-उड़ कर वह निरंतर परिश्रम करती रहती है। चारों दिशाओं से तिनका तिनका जोड़ जोड़ कर अपना घोंसला तैयार करती है, जिसमें वह रह सके।
जब उसका प्रणय समय आता है (Breeding period ) तब वह संसर्ग कर अंडे देती है। अपने शिशु को पालने पोसने के लिए वह घोर प्रयत्न करती है ताकि उसका पेट भर सके, शत्रुओं शिकारियों से रक्षा कर सके। परन्तु जब उसी बच्चे के पंख निकलते हैं तो वह अपने माँ बाप को भुला कर दूर उड़ कर चला जाता है।
ऐसे ही, ठीक इस प्रकार हर मनुष्य कर्मरत है और निरंतर चिड़ियों और पशुओं की तरह ऐसे ही कर्म करने में लगा पड़ा हुआ है। यह ऐसी अविजित माया है जो सभी जीव को मोहपाश में बांधकर नाच नचा रही है और सभी लोगों को विष और गन्दगी खिलाये जा रही है। सभी कर्म कर रहे हैं निरंतर। न ही मनुष्य के कर्म में अंतर है ना ही पशु और पक्षियों के कर्म में। सब एक ही कर्म कर रहे हैं माया से प्लावित होकर।
परन्तु विश्व के समस्त धर्मशास्त्र और ग्रन्थ एक अंतर अवश्य बता रहे हैं, वह है मनुष्य देह का बुद्धिप्रधान होना, जिसके कारण उसके समस्त कर्म पशुओं के कर्मों से भिन्न हो जाते हैं। पशुओं में सभी कर्म एकमात्र अपनी देह के निमित्त होता है और उन्हें अपना भविष्य और आत्मा के कल्याण की चिंता नहीं रहती।
पशुओं की योनि केवल भोग योनि है अर्थात यहाँ उनके किये हुए कर्मों को भोगवाया जाता है और उसमें अच्छे कर्म करने की स्वतंत्रता नहीं होती, पर मनुष्य योनि एक कर्मप्रधान देह हैं जहां आप अच्छे और बुरे कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसीलिए भगवान और उनके संत या भगवत प्राप्त महापुरुष की बात मानकर ऐसा कर्म करना चाहिए जिससे यह मनुष्य देह सार्थक हो सके।
इस संसार में कोई भी अपना नहीं हो सकता चाहे मनुष्य उसके लिए तरह-तरह के छल और बल लगा के मर जाए। एक दिन सभी अपना काम पूरा होते ही पंछी की तरह उड़ जायेंगे और तुम्हे देखेंगे तक नहीं कि तुम कहाँ हो और अंत समय में कोई काम नहीं आएगा। इसीलिए हमेशा ध्यान रखो कि संसार में मात्र व्यवहार करना है और प्रेम केवल भगवान से करना है। शरीर से संसार का काम और मन से भगवान और आत्मकल्याण के लिए कर्म।
जितना आवश्यक हो संसार में, जिससे तुम्हारा काम चल जाए बस उतना ही मतलब संसार से रखो बाकी समय भगवान के प्रेम में तड़प कर आँसू बहाओ। भगवान् के प्रेम को पाने और उनसे मिलने के लिए प्रेम में व्याकुल होकर निरंतर आँसुओं की वर्षा करो ताकि मन गंगाजल के समान निर्मलऔर शुद्ध हो जाए।
इसीलिए शुद्ध व्यक्तित्व और महापुरुषों (जिनका श्वेत हृदय है) उनकी बात मानकर तुरंत आत्मकल्याण में जुट जाओ और इस संसार रूपी दलदल में मत फँसो।
अरे मन ! सब तेरो खिलवार । नहिं कछु भल अनभल इहि जग मंह, जो दिखत तेरो रचनार । तू नीको तो जग यह नीको, आनंदहिं दे बंद किवार । तू अनभल तो यह जग फीको, रुदन होत रस रंग बहार । प्रेरित कर तू ही करवावत, सब सों नित नित कर्म प्रकार । कहत "श्वेत" तू ही इक कारण, घूमत इत उत यह संसार ।
भावार्थ:- ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः’ अर्थात् मन ही मनुष्य के बंधन एवं मोक्ष का कारण है
चित्तमेव हि संसारः तत्प्रयत्नेन शोधयेत्। (मैत्रेयी उप०) —चित्त ही संसार है, उसका शोधन प्रयत्न से करना चाहिए ।
‘मनोमूलं हि संसारः’ अथवा ‘मनोमूलमिदं जगत्’
अर्थात् ‘मन ही संसार के मूल (जड़) में है।’ या ‘संसार मन मूलक है।’
मन की चंचलता ही व्यक्ति को संसार में तृप्त नहीं होने देती ।
चित्तकर्म समुत्थाय संसारः परिकीर्तितः ।
अरे ओ, चंचल मन ! सब तेरा ही किया कराया है । सब तेरा ही खिलवाड़ है ।
इस जगत में कुछ अच्छा या बुरा नहीं है, जो अच्छा या बुरा दिखता है, सब तेरे कारण ही है ।
जिसे तू अच्छा मान ले वह अच्छा और जिसे तू बुरा मान ले वह बुरा प्रतीत होता है।
अगर तू प्रसन्न है, अर्थात अच्छा है तो सम्पूर्ण संसार रसमय और अच्छा प्रतीत होता है, तब एक बन्द दरवाजे में भी मनुष्य बहुत सुख का आभास करता है ।
अगर तू ठीक नहीं है, अर्थात अगर मन अप्रसन्न है तो क्लब, पार्टीज और आनंद देने वाली वस्तुएं भी फीकी लगती हैं ।
वहाँ जहाँ मनोरंजक वातावरण भी होगा तो वह भी अच्छा नहीं लगेगा और रोने का मन करेगा ।
अरे मन ! तू ही सबको अन्दर से प्रेरणा देकर विभिन्न प्रकार के कर्म (अच्छा या बुरा) करवाता रहता है ।
श्वेताभ कवि कहता है कि तू ही एकमात्र कारण है, तेरी चंचलता ही एकमात्र कारण है, जिसके कारण यह संसार इधर-उधर (चौरासी लाख योनियों में) घूम रहा है ।
निशिदिन बरसत नैन हमारे। जब ते पिय बिसराय गयो सखि, दिन रो निशि बीतत गिन तारे। नैनन ते अब कछु ना सुहाये, इकटक देखत द्वार मँझारे। रसना को कछु भावत नाहिं, पल पल पिय पिय नाम उचारे। कानन श्रवण करत नहिं कछु अब, सुनन चहत बैनन मतवारे। सुरभि शून्य अब भई नासिका, चाहत इक पिय गंध मँझारे। कहत “श्वेत” पिय आन मिलो अब, कर अश्वेत जीवन उजियारे।
भावार्थ:- एक विरहिणी श्यामसुंदर के वियोग में अपने ह्रदय के उदगार प्रकट करती है कि हे कृपालु श्यामसुंदर ! तुम्हारे वियोग में रात और दिन मेरे नैनों से अश्रुपात होता रहता है।
जब से तुम मुझे छोड़ कर गए हो और मुझे भूल गये हो, तभी से मेरा पूरा दिन तुम्हारे वियोग में रोते हुए बीतता है और रात तारें गिनते हुए अर्थात् तुम्हारे विछोह में मुझे नींद भी नहीं आती।
इन आँखों को अब कुछ भी नहीं अच्छा लगता, यह बस तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा में निरंतर द्वार की तरफ देखते रहते हैं कि कब तुम आ जाओ ।
इस रसना अर्थात जिह्वा को भी किसी प्रकार के व्यंजन अच्छे नहीं लगते न ही किसी प्रकार का भाषण अच्छा लगता है, बस ये तुम्हारे वियोग में प्रतिक्षण पिय पिय, श्याम श्याम की एक ही रट लगाए हुए हैं ।
मेरे कानों को भी अब कोई ध्वनि अच्छी नहीं लगती, बस ये तुम्हारे मधुर स्वर को सुनने के लिए व्याकुल और लालायित हैं ।
मेरी नासिका भी अब शिथिल पड़ गयी है, कोई भी गंध उसे प्रतीत नहीं होती, बस तुम्हारे उस दिव्य देह की सुगंध के लिए निरंतर लालायित है। यह श्वेत ह्रदय, विरह के कारण जो मन / अंतःकरण शुद्ध हो गया है (क्यूंकि भगवान् का दर्शन या उनके किसी भी विशेषता की अनुभूति शुद्ध हृदय द्वारा ही की जा सकती है) वह पुकार के तुमसे मिलने की उत्कृष्ट अभिलाषा प्रकट कर रहा है। अब आकर इस अन्धकार भरे जीवन को (भगवान के बिना जीवन एक अन्धकार के सामान ही है l) प्रकाशित कर दो।
सार:- भगवान् के वियोग में सारी इन्द्रियों ने अपना काम करना बंद कर दिया है उन्हें बस केवल एकमात्र श्यामसुंदर की ही अभिलाषा है । जब यह स्थिति आती है, जैसे मछली जल बिना तड़पती है, भगवान को पाने की इस उत्कृष्ट अभिलाषा पर ही भगवान् का दर्शन संभव है ।
फूँकि फूँकि इक इक पग डारो। इहि जग में सब गड़बड़ झाला, तन उज्जवल पर सब मन कारो। जहँ नहिं मति सचेत रह्यो तहँ, निज जन भी करि दे मक्कारो। तुम्हरो बनि सब तुम्हहिं लूटिहैं, जब सचेत तब तक सब हारो। निज स्वारथ हित करत निरंतर, जानि जानि जहँ तहँ अनाचारो। कहत “श्वेत” इमि अश्वेत जगत में, बुधि प्रकाश से कर उजियारो।
भावार्थ:- इस संसार में एक एक कदम फूँक फूँक कर रखना चाहिए । हर वक्त, हर जगह, हर विषय में सचेत रहना चाहिए। इस संसार में हर जगह गड़बड़ है, लोग बाहर से तो बहुत मृदु व्यवहार करेंगे और अच्छे प्रतीत से होंगे परंतु हृदय में कलुष भरा रहता है। तन तो गोरा रहता है पर मन अंदर से काला का काला ।
जहाँ कहीं भी बुद्धि से सचेत होकर काम नहीं किया और विश्वास कर लिया वहाँ अपने ही लोग विश्वासघात तक कर देते हैं।
तुम्हारा बनकर लोग तुम्हें ही लूटेंगे और जब तक कुछ पता लगेगा तब तक तुम्हारा सब कुछ लुट चुका होगा।
अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु यह संसार जानते हुए भी की यह कार्य गलत है, फिर भी अनाचार करता है।
इसीलिए इस काले जगत अर्थात जो अनाचार और स्वार्थ युक्त जगत में अपने सही एवं शुद्ध ज्ञान और विवेक के प्रकाश से सन्मार्ग पर चलना चाहिए ताकि जगह-जगह ठोकर खाने से बच सको।
अरे मन ! दिन दिन बीतत जात। काल कुठार लिए कर डोलत, देखत पल पल घात। शनैः शनैः यह देह झरत नित, ज्यों तरुवर ते पात। बढ़त रहत विषयन सों प्रीती, नहिं कोऊ अनुपात। नीर बढ़त घट छिन छिन ऐसो, रह कछु पलहिं डुबात। पल पल बढ़त सूर्य अस्तांचल, द्रुतगति होइहैं रात। बेर न करि अब तोरि के जग ते, जोरि ले उन संग नात। “श्वेत” प्रभात काज सब करि ले, अन्यथा रात ठगात।
भावार्थ:- अरे मन ! जीवन हर दिन प्रतिपल बीतता ही जा रहा है, निरंतर बीत रहा है । काल, समय, मृत्यु अपना कुठार लिए हर पल घूम रहा है और घात लगाने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है l
धीरे-धीरे यह मानव देह निरंतर ख़त्म हो रहा है जैसे किसी वृक्ष पर से पत्ते झरते रहते हैं। परन्तु फिर भी निरंतर सांसारिक विषयों के प्रति हमारा मन आसक्त होता जा रहा है बिना किसी अनुपात के।
धीरे-धीरे मानव देह क्षणभंगुरता की और बढ़ता चला जा रहा है जैसे एक नदी में पड़े घड़े में जल भरता जा रहा है और कुछ ही पल में वह पूरा डूब जाएगा।
हर एक क्षण मानव देह का सूर्य अस्तांचल की तरफ निरंतर बढ़ रहा है बहुत जल्दी ही रात हो जायेगी, अर्थात्‌ सुर-दुर्लभ कर्म देह बहुत जल्दी ख़त्म हो जाएगा।
इसलिए हे मन ! अब तू बिलकुल भी देर न कर और संसार के सभी नाते-रिश्तों को मन से तोड़कर (तन से नहीं) उससे जोड़ ले जिसका तू अंश है (भगवान कृष्ण)।
अरे मन ! इस उज्जवल (श्वेत) सुबह और दिन में ही अपना सब काम निपटा लो अर्थात् मानव देह में ही भगवत्प्राप्ति कर लो, अन्यथा काली रात होने पर ठगे से रह जाओगे ।
इसलिए-
भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढ़मते।