भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

चेतना शर्मा

मेरा नाम चेतना है। मैं दिल्ली की निवासी हूँ।
हरि-गुरु की कृपा से आरंभ से ही घर का वातावरण आध्यात्मिक रहा है। घर में हर प्रकार की पूजा-पाठ, नित्यकर्म, कीर्तन आदि हमेशा से ही होते रहे हैं। मुझे भी कथा-कीर्तन आदि में बहुत आनंद आता है।
घर का वातावरण आध्यात्मिक रहा है लेकिन अध्यात्म का सही अर्थ परम आदरणीय श्री श्वेताभ पाठक भैया जी के सान्निध्य में आकर ज्ञात हुआ। श्री श्वेताभ पाठक भैया जी के सान्निध्य में रहकर अनेक भ्रांतियाँ दूर हुई हैं। पहले मैं सिर्फ कथा और कहानियों में ही रहती थी लेकिन भैया जी द्वारा बताई गई रूपध्यान विधि के द्वारा मालूम हुआ कि असली आनंद मन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। मैं पहले सिर्फ “एक लोटा जल, सारी समस्या का हल” इसी में ही लगी रहती थी। भैया जी के सान्निध्य से ज्ञात हुआ कि आँसू कैसे आते हैं भगवान के लिए, उनके विरह में कैसे रोया जाता है। ‘अध्यात्म दर्शन’ ग्रुप में रहकर अनेक प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हुए, मन की सारी भ्रांतियाँ दूर हो गई हैं। भैया जी के द्वारा लिखे गए लेख मन में उत्पन्न सारी उलझनों को एक क्षण में सुलझा देते हैं और आध्यात्मिक सुख की अनुभूति होती है।
समय-समय पर भैया जी द्वारा साधना शिविर आयोजित किए जाते हैं। इन साधना शिविरों के द्वारा हम क्रियात्मक साधना कर सकते हैं, शिविर के माध्यम से हम अपनी साधना को बढ़ा सकते हैं। सभी को शिविर में जरूर पहुँचना चाहिए क्योंकि हम जैसे सांसारिक व्यक्तियों के लिए साधना को बढ़ाने का यही एकमात्र उपाय है।
परम आदरणीय श्री श्वेताभ पाठक भैया जी के इस सान्निध्य और प्रेम की मैं अनंत जन्मों तक ऋणी रहूंगी। श्री हरि-गुरु चरणों में यही प्रार्थना है कि मनुष्य जन्म का जो लक्ष्य है, वह श्री भैया जी के सान्निध्य में रहकर प्राप्त करूँ।