भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

Shwet Discourses

(साधक प्रश्नोत्तरी)

नहीं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश पूर्ण ईश्वर में नहीं आते । ये केवल सृष्टि को चलाने के निमित्त हैं । ये पदवी होती है, जैसे – प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, फाइनेंस मिनिस्टर इत्यादि । उदाहरण स्वरुप, हमारे ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा जी के चार मुख हैं । और भी करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं, सभी ब्रह्मांडों के अनंत ब्रह्मा, अनंत विष्णु, अनंत शंकर हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि का निर्वहन करते हैं । इन्हें हम गँवारी भाषा में ईश्वर कह देते हैं क्योंकि ये भगवान या ईश्वर के स्वांश होते हैं ।
वेद कहता है कि कोई भी जीव शंकर बन सकता है, इंद्र बन सकता है, ब्रह्मा बन सकता है, विष्णु बन सकता है एकमात्र अपने साधना स्थिति एवं अपने कर्मों से । वह उनकी पदवी के योग्य हो जाता है । इन्हें ईश्वर इसीलिए कहा जाता है क्योंकि इन पर योगमाया हावी नहीं होती और इनका प्रत्येक कार्य भगवान के अनुसार ही होता है और इस पदवी पर आने का मतलब वह भगवान के समान ही हो गये ।
भगवान भी कई प्रकार के होते हैं । एक भगवान परम पुरुष होता है जो मुख्य होता है । उन भगवान से एक और भगवान प्रकट होते हैं उसको कहते हैं प्रथम पुरुष । प्रथम पुरुष भगवान या श्री कृष्ण के ही अंश हैं, उनको महाविष्णु भी कहते हैं । अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के निर्माण करने में पहला काम महाविष्णु का होता है । श्री कृष्ण या परम पुरुष सृष्टि वगैरह का कार्य नहीं करते । सृष्टि वगैरह का कार्य बहुत नीचे वाले भगवान करते हैं । ये सृष्टि वगैरह का कार्य ब्रह्मा, विष्णु, शंकर करते हैं ।
“न करोमि स्वयं :।”
वेद कहता है ! प्रथम पुरुष ने संकल्प किया और प्रकृति की ओर देखा । प्रकृति माने माया, बहिरंग माया । ये बहिरंग माया भी दो प्रकार की होती है – एक जीव माया और दूसरी गुण माया । आगे बहुत सी बातें हैं । जीव माया में भी भेद है । गुण माया के भी प्रकार हैं । बहुत सी बातें हैं ये समझ लो विष्णु भी तीन प्रकार के होते हैं -कारणार्णवशायी विष्णु ( प्रथम पुरुष ), गर्भोदाशायी विष्णु ( अनंत कोटि ब्रह्मांड में व्याप्त ), क्षीरोदाशायी विष्णु ( ये प्रत्येक जीव के अंतःकरण में प्रविष्ट हो गये ) जिसे लोग लक्ष्मी जी वाले विष्णु कहते हैं जो क्षीर सागर में रहते हैं ।
ब्रह्मा, शंकर, विष्णु के जनक हुए गर्भोदाशायी और इनके जनक कारणार्णवशायी। बहुत सारी बातें हैं, जब गहराई में जाओगे तब पता लगेगा । ये सब बातें जो फैलाई गयी हैं भ्रम में, वह एकमात्र लोगों का इस विषय में कम ज्ञान होना है । वरना वेदों में पूरा विज्ञान भरा पड़ा है ।

अब जीव समझिए-
जीव :- एक होती है आत्मा जो ब्रह्म स्वरूप है ।
अमृतस्य वै पुत्रा: ।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुख राशी ।।

इसको सृष्टि के प्राकट्य के समय भगवान उसे बहुत तत्त्वों को देते हैं, इसे कारण शरीर बोलते हैं । कारण शरीर प्रकृति के तीन गुणों से मिलकर बनता है सत, रज, तम ।
इसके बाद आता है सूक्ष्म शरीर- जिसके सूक्ष्म मन, इन्द्रियाँ, बुद्धि, चित्त, अहंकार इत्यादि सब होता है । इसके अंदर कुल मिलाकर चौबीस ( 24 ) तत्त्व होते हैं । पाँच तन्मात्रा– जल, तेज, आकाश, पृथ्वी, वायु । पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ– आँख, नाक, कान, रसना, त्वचा जिनका विषय है – रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श ग्रहण करना । पाँच कर्मेन्द्रियाँ – हाथ, पैर, गुदा, मुँह, लिंग । पाँच वायु– प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान । इसके बाद मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार । कुल मिलाकर 24 तत्त्व से यह बना होता है ।

स्थूल शरीर वह है जो हम अपनी आँखों से देख पाते हैं । जन्म लेने पर यही शरीर दिखता है और मरने पर यही शरीर यहीं रह जाता है । जो बाहर निकलता है स्थूल शरीर से, वह है सूक्ष्म शरीर जिसे लोग भूत प्रेत का नाम देते हैं । तो यह जीव है, जीव माया से आच्छादित है ।

अब माया को समझिये-
माया :- यही वह तत्त्व है जिससे संसार चलता है या चलायमान है । यह न हो तो संसार खत्म । इसके बिना संसार की परिकल्पना असम्भव । ये तीन तत्त्व अनादि हैं – ब्रह्म, जीव, माया । माया के तीन गुण हैं :- सत, रज, तम । इन्हीं गुणों से वह सृष्टि का संचालन करती है । यह माया बड़े-बड़े पर हावी रहती है ।

जग पेखन तुम देखनिहारे । विधि हरि शंभु नचावन वारे ।।
इसी माया के अंतर्गत ब्रह्मा, विष्णु, महेश सभी कार्य करते हैं । लेकिन माया के दो रूप हैं । एक माया हम सब मायिक जीवों जो भगवान के विभिन्न अंश है, उस पर कार्य करती है । एक माया जिसे योगमाया कहते हैं, वह भगवान के स्वांशों पर कार्य करती है अर्थात संतों महापुरुष या विष्णु, ब्रह्मा, शंकर पर । यह मायातीत लोग हैं इन पर साधारण माया नहीं हावी होगी । इन पर योगमाया कार्य करती है । यह भगवान की आंतरिक और गुहतम शक्ति है ।
माया से ग्रसित जीव अपना स्वरूप भुला कर कार्य करते हैं और उसी कार्य में लिप्त हो जाते हैं । योगमाया से कार्य करने वाले जीव या भगवान, अपने स्वरूप में स्थित होते हुए भी उस कार्य से निर्लिप्त रहते हैं । जैसे – भगवान शंकर क्रोध का सब कार्य करेंगे, ब्रह्मांड भस्म कर देंगे लेकिन अपने “स्व” स्वरूप में स्थित रहेंगे ।
महापुरुष हर काम, क्रोध, लोभ, मोह की acting करते दिखेंगे लेकिन उससे निर्लेप रहेंगे । यशोदा जी की छड़ी पड़ रही है, भगवान डर के मारे थर-थर काँप रहे हैं तो यह एक्टिंग है । यशोदा जी भगवदप्राप्त महापुरुष हैं लेकिन कृष्ण लीला के समय वह यह भूल गयीं कि कृष्ण ब्रह्म हैं और वह कोई साधारण स्त्री नहीं । यह सब योगमाया के कार्य हैं ।
रावण, कंस इत्यादि सब महापुरुष हैं लेकिन लीला में सहयोग करने के लिए योगमाया के द्वारा भगवान उनसे यह सब कार्य करवाते हैं लेकिन अंदर से वह अपनी सत्ता में रहते हैं । हम मायिक लोग अपनी सत्ता में नहीं रहते । हमारा बेटा मर जाए, स्त्री मर जाये, पति मर जाये, चार रुपये खो जाएं, देखिये छः-छः महीने तक हालत खराब हो जाती है । कई लोग आत्महत्या तक कर लेते हैं । तो हम अपनी सत्ता में नहीं रह पाते और उसको सत्य मानते हैं जो माया द्वारा चलता है । तो यह है माया, इसी से उत्तीर्ण होना है ।

माया के दो स्वरूप होते हैं । एक अविद्या माया ( रजो गुण, तमो गुण )यह और दूसरी विद्या माया ( सतोगुण ) ।
अविद्या माया को स्वरूपावरिका माया भी कहते हैं । विद्या माया को गुणावरिका माया भी कहते हैं । जो ब्रह्म के उपासक होते हैं, उन्हें ज्ञानी कहते हैं । ज्ञानी अपना स्वरूपावरिका माया तो हटा लेते हैं परंतु गुणावरिका माया नहीं हटा पाते ।
“मम माया दुरत्यया ।” इसी को हटाने पर ही इतना आनंद मिलता है कि हम कल्पना नहीं कर सकते । इसी को ज्ञानी समझते हैं कि उन्हें सब मिल गया बल्कि यह तो अभी 50% ही हुआ है । लेकिन ज्ञानी लोग इसे ही मुक्ति समझ लेते हैं ।

गुणावरिका माया भगवान की कृपा के बिना नहीं जाती । अतः सबको भक्ति पर या भगवान की कृपा का ही सम्बल लेना पड़ता है । बिना गुणावरिका माया या सतोगुण जाए, भगवदप्राप्ति असम्भव है और पतन भी है । जैसे – जड़ भरत का हुआ, सौभरि मुनि का हुआ इत्यादि क्योंकि ब्रह्म कुछ नहीं करता । ज्ञानी अपने ज्ञान और साधना के बल से स्वयं से स्वरूपावरिका माया तो हटा लेते हैं लेकिन गुणावरिका माया नहीं हटा पाते क्योंकि वह भगवान की शक्ति है जो भगवान की कृपा से जाती है । और ब्रह्म कुछ करता नहीं तो अंत में सबको भगवान की शरण में ही आना पड़ता है ।

ये जितने आप परमहंस, बड़े-बड़े फकीर देखते हैं यह सब स्वरूपावरिका माया से परे हो चुके हैं लेकिन गुणावरिका माया अभी नहीं गयी है । यह जाएगी सगुण साकार की उपासना करने पर । इसीलिए भगवान शंकराचार्य जी ने सब बड़ी-बड़ी बातें समझाईं और अंत में फिर एक ही बात कही कि बिना श्रीकृष्ण भक्ति के माया से पार नहीं हो सकते और न ही भगवदप्राप्ति होगी । ये श्रीकृष्ण का अर्थ राम, कृष्ण, शिव, शक्ति सभी से समझिए ।
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ब्रह्म के विषय में पहले चर्चा हो चुकी है । यह भी बताया गया कि ब्रह्म कुछ नहीं करता, वह केवल सत्ता मात्र है और अपनी सत्ता को बचाये रखता है । निर्गुण निर्विशेष निराकार ब्रह्म अपनी शक्तियों को निरूपित करने के लिए सगुण, सविशेष, साकार भगवान या परमात्मा में स्वयं को प्रकट करता है । इसी परमात्मा या भगवान की शक्तियाँ हैं जो सम्पूर्ण चर-अचर जब तब कब सब का संचालन करती है । यह संचालित करने के लिए त्रिगुणात्मक शक्ति द्वारा वह स्वयं को निरूपित करती है जिसे सत, रज और तम कहते हैं । यह सब भगवान की शक्तियाँ हैं । प्रत्येक शक्ति अलग-अलग कार्यों को निष्पादित करती है ।
वही परमात्मा या ईश्वर या भगवान जब संसार का पालन करते हैं तो उन्हें विष्णु बोल दिया जाता है । वही परमात्मा या ईश्वर या भगवान जब संसार की सृष्टि करते हैं तो उन्हें ब्रह्मा बोल दिया जाता है । वही परमात्मा या ईश्वर या भगवान जब संसार का लय करते हैं तो उन्हें शंकर बोल दिया जाता है । वह जिस शक्ति का आलंबन लेकर यह तीनों कार्य करते हैं उसे शक्ति या योगमाया या दुर्गा या आदिशक्ति बोल दिया जाता है ।

अब शिव क्या है ? शिव है इन सभी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के कार्य को निरूपित करने वाली शक्ति । शिव का अर्थ है कल्याणकारी या मंगल करने वाले या जो स्वयंसिद्ध हैं । यह शिव की शक्ति ब्रह्मा, विष्णु और शंकर से लेकर शक्ति में भी कार्य करती है और शिव शक्ति के ही आलंबन से सब कार्य करते हैं । हमारे ऋषि मुनियों ने ब्रह्म या भगवान या ईश्वर की विभिन्न शक्तियों को समझाने के लिए इनको रूपित कर लिया है ।
सब गोलमोल लग रहा है न ? तो चलिए उदाहरण से समझते हैं । ऐसे समझिये जैसे मिट्टी है या पृथ्वी है, इस मिट्टी के विभिन्न स्वरूप हैं । कोई मार्बल है, कोई कोटा पत्थर है, कोई लाल पत्थर है, कोई कुछ पत्थर है । हैं सब मिट्टी ही । बस विभिन्न दबाव, तापमान और कालावधि के कारण मिट्टी के विभिन्न स्वरूप हो गए हैं । मिट्टी समझिये ब्रह्म को । वह पानी में घुल जाएगी मतलब वह किसी कार्य की नहीं है । लेकिन जब वह चट्टानों और पत्थरों में स्वरूप बदलेगी तब उसका उपयोग किया जा सकता है । लेकिन composition की दृष्टि से सभी मिट्टी हैं, बस गुण विशेषता अलग-अलग हैं ।
ऐसे ही हीरा, पन्ना, मूँगा, स्वर्ण से लेकर सभी धातुओं का उद्गम मिट्टी ही है । लेकिन अपने गुण विशेषता के कारण वह अलग-अलग नामों से परिभाषित हैं ।
अब दूसरा उदाहरण समझिये । कोई व्यक्ति है जिसका नाम आशुतोष है । वह अपनी कंपनी में मैनेजर साहब के नाम से जाना जाता है क्योंकि वहाँ वह अपने विशेष गुणों का उपयोग करता है । वह अपने मित्रों में मित्र या यार के रूप में जाना जाता है । वह अपनी पत्नी के लिए पति के रूप में जाना जाता है । वह अपने बच्चों में पापा या डैडी या पिता के रूप में जाना जाता है ।
वह अपने माँ और पिता के पास बेटे के रूप में जाना जाता है । वह अपनी प्रेमिका के पास प्रेमी, बाबू शोना, बेबी के रूप और नाम से जाना जाता है । वह अपने नौकर के पास मालिक के रूप में जाना जाता है । वह अपने किसी शत्रु के पास शत्रु रूप में जाना जाता है । वह जब अपने बच्चों के साइकल की chain उतर जाती है तो वही मैनेजर साहब और तरह-तरह की उपाधि से अलंकृत व्यक्ति cycle का mechanic बनकर chain चढ़ा देता है । वही जब भगवान के पास जाता है तो भक्त बनकर जाता है ।
यह सारे व्यक्ति क्या अलग हैं ? नहीं, यह सभी व्यक्ति आशुतोष नाम का वही व्यक्ति है भले किसी भी नाम से पुकारा जाय । इसी तरह ब्रह्म या ईश्वर या परमात्मा है जो विभिन्न शक्तियों से अपना कार्य करते हैं । इसीलिए वेदों में कहा गया है :-
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ।
वह एक है लेकिन बहुत नामों से जैसे विष्णु, शंकर, ब्रह्मा, गणेश, दुर्गा इत्यादि नामों से जाना जाता है । इस मन्त्र का उपयोग लोग आजकल विभिन्न धर्मों के लिये प्रयोग करते हैं जो कि इस मंत्र की व्यापकता पर विराम लगाता है ।
इसी तरह अन्य उदाहरण से समझिये । जैसे – ऊर्जा ( Energy ) है, वह चाहे e।ectrica। energy हो, चाहे potentia। हो, चाहे atomic हो, चाहे kinetic हो, चाहे mo।ecu।ar हो, चाहे therma। हो, चाहे nuc।ear हो, चाहे chemica। हो सभी energy ही हैं ।
इसीलिए यह सब शक्तियाँ ब्रह्म ही हैं । उनको अलग-अलग नामों, रूपों, गुणों से परिभाषित किया गया है । इसलिए ये सभी शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश इत्यादि सभी ब्रह्म ही हैं ।
श्वेताभ की आँखें देखेंगी तो लोग यही कहेंगे कि श्वेताभ देख रहा है । श्वेताभ की नासिका श्वांस लेगी तो श्वेताभ ही सांस ले रहा है । श्वेताभ हाथों से लिख रहा है तो श्वेताभ ही लिख रहा है । श्वेताभ की जीभ और कण्ठ बोलेगें तो श्वेताभ ही बोल रहा है । श्वेताभ के पैर चलेंगे तो श्वेताभ ही चल रहा है ।
इसीलिए बार-बार शास्त्रों में चेताया गया है कि शिव और विष्णु में भेद करना नामापराध है । शिव की शक्ति से विष्णु हैं और विष्णु की शक्ति ही शिव है । एक बार ऐसे ही मेरे मन में आया कि गणेश जी तो लौकिक देवता हैं । तुरन्त उसी दिन स्वप्न में आकर मुझे पूरी रात यह बताया गया कि गणेश जी सदा से ब्रह्म हैं ।
जैसे – भगवान स्वयंभू और सदाशिव हैं वैसे ही भगवान गणेश स्वयंभू और सदा से गणेश हैं । यह शक्ति सदा से रही है । बस समय आने पर कुछ कार्यों के निरूपण के लिए और लीला माधुरी का विस्तार करने के लिए सगुण रूप से विभिन्न रूपों में अवतरित होते हैं । इसीलिए मैं सबको ब्रह्म कहता हूंँ ।