भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

आशुतोष सिंह

मेरा नाम आशुतोष सिंह है । मैं उत्तर प्रदेश के आगरा जिले का निवासी हूँ और पेशे से सरकारी प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक के पद पर हूँ । एक हिंदू परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन से ही पूजा-पाठ में सामान्य रुचि थी । तरीका वही था जो अधिकतर लोगों का आज भी है । सुबह स्नान करो, आँखों से दर्शन कर लो, हाथ से घंटी बजा लो और धूप घुमा दो, प्रसाद खा लो, कुछ चालीसा इत्यादि पढ़ लो- कभी हनुमान चालीसा, कभी दुर्गा चालीसा, कभी शिव चालीसा, कभी व्रत रुचि अनुसार रख लो और जो व्रत का अलग भोजन है उसे ग्रहण करो । (ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऊपर लिखी किसी भी क्रिया में मन को कैसे शामिल करना है यह ज्ञात नहीं था ।) प्राथमिकता में कभी भगवान को नहीं लिया गया । प्राथमिकता वही थी कि प्रथम कक्षा से लेकर स्नातक तक पढ़ाई करें, उसके बाद नौकरी, अपना घर, फिर अपना परिवार और एक सुखमय जीवन । फिर अगर समय मिले या भगवान की याद आ जाए, भगवान से कुछ मांगने की जरूरत महसूस हो, कभी जिंदगी में कोई दु:ख आ जाए या किसी सात्विक स्थान पर मनोरंजन का मन हो तो भगवान के मंदिर जाया जा सकता है । यानी एक तो सकाम भक्ति उसमें भी प्राथमिकता में संसार। बचपन से ही मन अशांत रहता था, भगवान को जानने की इच्छा प्रारंभ से ही थी मगर जो भी मिलता अपने मन के अनुसार भगवान की परिभाषा बता कर चला जाता । मैं भी वही करने लगता मगर मन को कोई सुख या आनंद नहीं मिलता। कुछ समय बाद एक संस्था से जुड़ना हुआ, वहाँ भगवान के नाम जप के बारे में जाना, नियमानुसार माला करना भी प्रारंभ किया, दीक्षा भी हो गई मगर मन के सवाल वहीं के वहीं रहे और मनोस्थिति जस की तस ही रही । हमेशा यह विचार रहता कि आनंद क्यों नहीं मिलता, माला करने पर भी व्यवहार में परिवर्तन क्यों नहीं आता, माला करने पर भी चेतना में भगवान नहीं बसते, इसी तरह के प्रश्नों के साथ जीवन के 33 साल गुजार दिए ।

मगर मैंने सुना था कि अगर भगवान के लिए बेचैनी हो तो गुरु स्वयं आपको खोज लेते हैं। इसी क्रम में 2022 में एक फेसबुक पेज के माध्यम से परम आदरणीय श्री श्वेताभ पाठक भैया जी से जुड़ना हुआ। वहाँ से इनके व्हाट्स ऐप ग्रुप के बारे में पता चला, उत्सुकतावश मैं भी ग्रुप में जुड़ गया । ग्रुप में ज्ञात हुआ कि यहाँ हर तरह के प्रश्न किए जा सकते हैं जिनका जवाब आपको वेदों, पुराणों, उपनिषदों, शास्त्रों और संतों की वाणियों के आधार पर दिया जाएगा। मैंने भी अपने मन के प्रश्न पूछना शुरू किया, मुझे उत्तर मिलते गए। सैकड़ों प्रश्न और उनके प्रामाणिक उत्तर । मेरे मन में हमेशा यह ख्याल आता कि यह कैसा इंसान है जो अपना इतना कीमती समय सिर्फ मेरे जैसे मूढ़ लोगों के कल्याण हेतु व्यय कर रहा है l मगर इनका एक-एक जवाब मेरे ज़हन में अंदर तक वार करता और जवाब ऐसे-ऐसे जो कभी ना तो पढ़े ना सुने। सारी भ्रांतियों को तोड़ने वाले प्रामाणिक जवाब, स्थापित सिद्धांतों को ध्वस्त करने वाले प्रामाणिक जवाब। अब मुझे श्वेताभ पाठक भैया जी की दिव्यता पर कोई संदेह नहीं रहा। अरे! संतों का मूल कार्य तो यही होता है कि सभी के संशयों को काटते हुए, उनके जन्म-मरण के बंधन को काटते हुए, उन्हें भगवान के नाम, रूप, गुण, लीला, धाम के परम आनंदमय रस से परिचित कराना। मैं हमेशा सोचता था कि मुझे सैकड़ों ज्ञानी लोग मिले मगर इस तरह के जवाब, समय, ज्ञान व प्रेम मुझे किसी ने नहीं दिया। बल्कि कई जगह तो प्रवेश ही वर्जित होता है, गुरु से मिलने के लिए बहुत इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में गुरु से लाभ लेने का तो सवाल ही नहीं उठता। मन में उठते हुए अनंत प्रश्नों का तूफान और गुरु से मुलाकात ही संभव नहीं तो ऐसे में भक्ति कैसे बढ़े ? मगर यहाँ श्वेताभ पाठक भैया जी के साथ मामला कुछ भिन्न था। जितने शालीन उतने ही भक्ति में गंभीर, कितने ही व्यस्त क्यों ना हों भक्ति संबंधी वार्तालाप के लिए हमेशा हाजिर, कभी अहंकार का लेश भी उनमें नहीं देखा, कभी किसी भी निचले से निचले स्तर के प्रश्न का भी धैर्य पूर्वक ही जवाब दिया ।

समझ आया कि वास्तविक भक्ति क्या है, भक्ति तो इंद्रियों अर्थात आँख, नाक, कान, त्वचा, रसना का विषय है ही नहीं। भक्ति तो सिर्फ और सिर्फ मन का विषय है। हम हजारों बार भगवान के सामने गए मगर मन हमेशा संसार में रहा, बस इंद्रियाँ भगवान में रहीं और ऐसा करते-करते हमारे अनंत जन्म बर्बाद हो गए । हमने इंद्रियों से जो भी किया उस वक्त मन हमारा कभी भगवान में रहा ही नहीं । मन हमेशा घर में, दोस्तों में, खेल में, व्यसनों में ही रहा जबकि इंद्रियाँ मंदिर के अंदर थीं उस पर ये अहंकार और पुष्ट था कि साहब हम तो रोज मंदिर जाते हैं । भैया के लेख पढ़ते-पढ़ते लाखों जन्मों का अज्ञान, मन की गंदगी अब साफ होती सी प्रतीत हुई । महज़ एक साल के संग ने ही भक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखला दिया । अब पता चल गया था कि भगवान से डरना नहीं हैं बल्कि उन्हें प्रेम करना है और प्रेम में भय का लोप हो जाता है। अब पता चल गया था कि इन्द्रियाँ गटर में भी रहें तो भी मन भगवान में लगाया जा सकता है। मन का भगवान में लगना ही भक्ति है। भक्ति जहाँ से भी बढ़े वहीं जाना चाहिए चाहे उस जगह का नाम कुछ भी हो। जिस कार्य से मन भगवान में लगे वही कार्य उत्तम है। मन को भटकने से बचाने के लिए श्री श्वेताभ भैया ने रूप-ध्यान के बारे में बताया, यह ऐसी विधि है जो सिर्फ मन से ही हो सकती है । भटकने का तो अब प्रश्न ही नहीं उठता। मन से भगवान का रूप बनाना, सेवा करना, उनका श्रृंगार करना, लीला ध्यान करना, हर जगह बस मन मन मन । ऐसे में मन कैसे भटके जब सीधे उसे ही सेवा में लगा दिया गया हो। हाथ, पैर, शरीर कहाँ है इस बात से अब कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि भक्ति मन को करनी है शरीर को नहीं, यह सिद्धांत पुष्ट हो चला था। भगवान को याद करने का तरीका पता चल गया था, अब वो थकान आनंद में परिणत हो चली थी, भगवान को महसूस किया जाने लगा। यह सिद्धांत भी पुष्ट हो गया कि नाम जप में भी जब तक मन में भगवान के गुण, रूप, लीला, धाम का चिंतन ना हो, तब तक कोई लाभ नहीं । कभी सोचा नहीं था कि भगवान को एक प्रेमी की तरह प्रेम करना है, उनके लिए रोना है, उनके लिए तड़पना है, बिलखना है। उन आँसुओं में जो आनंद है वो ब्रह्म-पद में भी नहीं है । प्रेम में तड़प इतनी बढ़ानी है कि उन्हें याद अलग से ना करना पड़े बल्कि हर वक्त वह चेतना में रहें । इसी प्रयास में भाई श्री के सान्निध्य का निरंतर लाभ लेते रहे ।

श्री श्वेताभ भैया जी यह बात बार-बार दोहराते हैं कि अगर भगवान से प्रेम है और हमारा प्रेमी हमारे साथ नहीं है तो उसके विरह में आँसू निकलना बहुत स्वाभाविक है । आँसू ही हैं जो प्रेम को बयाँ करते हैं । सभी संत चाहे वह मीराबाई हों या सूरदास, कबीरदास, संत रैदास या रसखान सभी ने भगवान के प्रेम में आँसू बहाए हैं । बस यही प्रेम हमें भी करना है ।
मैं आदरणीय श्री श्वेताभ पाठक भैया जी का हृदय से, रोम-रोम से आभारी हूँ कि उन्होंने वास्तविक भक्ति का निचोड़ हमें दिया, उन्होंने ही प्रेम करना सिखाया, सिर्फ एक साल के संग में ये सब परिवर्तन हुए। रूपध्यान साधना को समझने के लिए भाई श्री अपने सभी जरूरी कार्यों को छोड़ समय-समय पर शिविर का आयोजन करते हैं ताकि क्रियात्मक साधना को बल मिल सके।अब हमारी साधना किसी वक्त, जगह, परिस्थिति की मोहताज नहीं क्योंकि यह सब तो शरीर पर असर डालती हैं और भक्ति मन को करनी है न कि शरीर को ।मुझे पूरा विश्वास है कि भगवान से प्रेम की यह अवस्था भाई श्री के सान्निध्य में नित्य प्रति बढ़ती जायेगी और अंत में हम अपने उस आनंद तक पहुँच सकेंगे जिसके हम अंश हैं और जिसकी तलाश में अनंत जन्मों से भटक रहे हैं ।
जय श्रीराधे।