भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।
ज्ञान से ही निर्मल प्रेमस्वरूपा भक्ति का उदय होता है
जो कुछ नहीं करना चाहते या जो स्वयं परिश्रम नहीं करना चाहते , वह सब कुछ प्रारब्ध और भाग्य का सहारा लेकर अपना सब नष्ट कर देता है ।
समय बहुत कम है , इसलिए गहनता और गंभीरता से विचार कर बुद्धि का प्रयोग कर परमार्थिक संसाधनों को इकट्ठा करने में जुट जाओ , पता नहीं कब काल की घण्टी बज जाए । इसलिए भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढ़मते
कर्म वही है , जो बंधन का कारण न हो और विद्या भी वही है जो जन्म मरण के बंधन से मुक्त करे , जो मुक्ति की साधिका हो ।
इसके अतिरिक्त और कर्म तो परिश्रम रूप तथा अन्य विद्यायें कला कौशल मात्र हैं ।
कल किया जाने वाला कार्य आज और सायंकाल में किया जाने वाला काम प्रातः काल में पूरा कर लेना चाहिए , क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखती कि इसका काम अभी पूरा हुआ है या नहीं ।
कोई भी कार्य जिसमें भगवान को प्राप्त करने का उद्देश्य निहित है , एकमात्र वही कर्म या धर्म या दया , दान , यज्ञ या कुछ भी सब निवृत्तिमार्ग का अधिकारी है ।
बस एकमात्र फार्मूला याद रखो भगवान को छोड़कर सभी किये गए पुण्य पाप के समान ही है ।
इस भ्रम में न रहे कि आप पुण्य कर रहे हो, आप मात्र अपने मन के बनाये हुए संसार के लिए कर रहे हो , यह वह वाला निष्काम पुण्य नहीं है ।
समस्त कर्म धर्म एकमात्र निवृत्तिमार्ग को लक्षित करते हुए ही करना है । भज गोविंदम भज गोविंदम गोविंदम भज मूढ़ मते।।
संसार में रहकर किये हुए “लौकिक” और “वैदिक” दोनों ही प्रकार के कर्म जीव को संसार की प्राप्ति अर्थात घोर दुःख की प्राप्ति कराने वाले ही हैं।