भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

भज गोविंदं भज गोविंदं
गोविंदं भज मूढ़मते।

गिरीश कुमार

गुरु जी के श्रीचरणों मे कोटि-कोटि प्रणाम।
मेरा नाम गिरीश कुमार है l मैं जयपुर, राजस्थान का निवासी हूँ।
आज शिविर समापन का दूसरा दिन सम्पन्न हो गया है, इन दो दिनों का अनुभव आप सभी से साझा करना चाहूँगा। शिविर से पहले ‘भाव’ समझ नहीं आ रहा था। भाव उत्पन्न करें-भाव उत्पन्न करें लेकिन कैसे करें, हो ही नहीं रहा था l अब घर आने के बाद लग रहा है कि कुछ तो हुआ है, कुछ हो रहा है। ईश्वर की तस्वीरें पहले निर्जीव सी लगती थीं परंतु अब सजीव लगने लगी है; ऐसा लगता है कि वह मुझे देख कर मुस्कुरा रहे हैं । ईश्वर का आभास अपने आस-पास होने लगा है, ‘भाव’ का अर्थ समझ आने लगा है। आज प्रभु मेरे साथ कार्यालय भी गए और वापस भी आये, गुरुजी की याद भी सतत बनी हुई है। शिविर वाला रूपध्यान करने की कोशिश की लेकिन संक्षिप्त हो जाता है; मन धीरे-धीरे न जाकर सीधे कैलाश धाम पहुँच जाता है l रोना भी आ जाता है ।
जिन भजनों में शिविर के पहले दिन आनंद नहीं आ रहा था, अब लगातार उन्हीं भजनों को सुन रहा हूँ । अब फालतू की गप-शप अच्छी नहीं लग रहीं, सांसारिक चिंतन भी कम हुआ है l
मुझे एक डर सता रहा है- क्या ये कहीं सिर्फ मेरा भ्रम तो नहीं है ? क्या ये अनुभव, भाव और जो स्तर बना है वह समय के साथ कहीं कम तो नहीं हो जाएगा ? क्या माया मुझे फिर से जकड़ तो नहीं लेगी ?
मेरा मन मुझे जल्दी सहमत कर लेता है। हाँ, मैंने आज तक कभी इतना बड़ा लेख नहीं लिखा वो भी हिंदी में; क्या यह भी शिविर का प्रभाव है ?
गुरुजी कृपया मेरा हाथ थामे रहना, मैं साधना पथ पर नित्य आगे बढूँ; ऐसी कृपा एवं मार्गदर्शन भी करना l
जय-जय श्री राधे।